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Wednesday, 16 July 2014

Congress, BSP slam Akhilesh govt for downsizing budgetary allocation for women panel

Akhilesh Yadav
"We condemn this move. When BSP was in power, it had started welfare scheme for the poor, Dalits and downtrodden," Bahujan Samaj Party chief Mayawati said here.

"This is the tragedy of our time. Life of a woman is considered lower than the value of a bicycle," Congress leader Renuka Chowdhury said.

A Right to Information (RTI) question posed by social activist Urvashi Sharma revealed that in the last three years, the Samajwadi Party government has slashed the budgetary allocations made to the state women's commission.

The state government informed the RTI activist that between 2011-12 and 2013-14, the budget of the women's panel was cut by over 85 percent.

In 2011-12, the commission got Rs.5.1 crore in financial grants and this went down to Rs.4.16 crore, of which Rs.3.9 crore was spent.

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Monday, 13 January 2014

Mayawati's bsp fight election in 500 loksaba seats

लखनऊ (अजय जायसवाल)। केंद्र की सत्ता में 'बैलेंस ऑफ पावर' बनने को बसपा एक बार फिर रिकार्ड 500 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर किस्मत आजमाएगी। पार्टी देश के दो दर्जन राज्यों की करीब सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारने की कवायद कर रही है। पार्टी का मानना है कि भले ही सब सीटों पर जीत असंभव हो लेकिन जनाधार में तो कुछ न कुछ इजाफा हो ही सकता है।

सात वर्ष पहले सोशल इंजीनियरिंग के दम पर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता हासिल करने के बाद भले ही बसपा का जनाधार पिछले कुछ वर्ष में गिरा है लेकिन पार्टी के हौसले में कोई कमी नहीं दिख रही है।
पार्टी 16वीं लोकसभा के चुनाव में कुल 543 संसदीय सीटों में से 500 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारियों में जुटी है। पार्टी कितनी सीटों पर नीला परचम फहराती है यह तो चुनाव बाद ही पता चलेगा, लेकिन किसी राष्ट्रीय पार्टी के सर्वाधिक प्रत्याशी उतारने का रिकॉर्ड पार्टी के ही नाम रहने की उम्मीद है। कारण है कि पार्टी सुप्रीमो मायावती स्पष्ट कह चुकी हैं कि बसपा किसी भी राज्य में किसी भी पार्टी से सीटों के संबंध में किसी तरह का कोई गठबंधन नहीं करेगी।


15वीं लोकसभा (वर्ष 2009) के चुनाव में बसपा ने सर्वाधिक 500 प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा था। इनमें से 21 सांसद बने। इसके अलावा सहयोगियों के लिए कुछ सीटों को छोड़ने से कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के भी 440 प्रत्याशी ही मैदान में थे। भाजपा भी गठबंधन के चलते 433 सीटों पर ही चुनाव लड़ी थी।

दो दर्जन राज्यों में उतारे थे प्रत्याशी
5वीं लोकसभा के चुनाव में बसपा ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने के साथ ही आंध्र प्रदेश की 40, बिहार की 39, गुजरात की 24, हरियाणा की 10, हिमाचल प्रदेश की 4, जम्मू-कश्मीर की 5, कर्नाटक की 28, केरल की 20, मध्यप्रदेश की 28, महाराष्ट्र की 47, उड़ीसा की 19, पंजाब की 13, राजस्थान की 24, तमिलनाडु की 37, पश्चिम बंगाल की 41, छत्तीसगढ़ की 12, झारखंड की 14, उत्तराखंड की 5, अंडमान-निकोबार, चंडीगढ़, दादर नगर हवेली व पुडुचेरी की 1-1 व दिल्ली की सभी 7 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। 2004 में हुए 14वीं लोकसभा के चुनाव में भी पार्टी ने गठबंधन न करके 25 राज्यों में 435 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिसमें से सिर्फ यूपी से ही 19 जीते थे। 

तीन दशक पहले बनी थी बसपा
अब राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी बसपा का गठन 14 अप्रैल 1984 को हुआ था। 1998 के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो पार्टी के सांसद बढ़ते ही रहे हैं। नवीं लोकसभा के लिए 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 18 राज्यों में 245 प्रत्याशी खड़े किए थे जिसमें से तीन पर उसे सफलता मिली थी। इसके बाद 1991-92 (सिर्फ पंजाब) में 10वीं लोकसभा के चुनाव में बसपा ने 243 प्रत्याशी उतारे जिसमें से पार्टी ने तीन पर ही विजय पताका फहरायी थी। इसी तरह 1996 के चुनाव में पार्टी ने 16 राज्यों की 210 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे जिसमें जीते नौ थे। राष्ट्रीय पार्टी बनने के बाद भी 1998 के चुनाव में बसपा ने 251 से ज्यादा प्रत्याशी नहीं उतारे थे लेकिन उसमें भी सफलता सिर्फ पांच पर मिली थी। ऐसे ही 1999 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 225 प्रत्याशी उतारे थे जिसमें से 14 विजयी हुए थे। 

लोकसभा चुनावों में बसपा प्रत्याशियों का लेखा-जोखा
वर्ष सीटें लड़ी सीटें जीती
1989 245 03
1991 243 03
1996 210 09
1998 251 05
1999 225 14
2004 435 19
2009 500 21


Source: Hindi News

Tuesday, 7 January 2014

Big problem prepared for large political parties in UP

लखनऊ [जाब्यू]। पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में अपना मुकाम रखने वाले चार छोटे दल [कौमी एकता दल, भासपा, महान दल और राष्ट्रीय परिवर्तन दल] और उनके चार सहयोगी दलों का एकता मंच सूबे की सियासत में नया गुल खिलायेगा। मंगलवार को इन आठ दलों के गठबंधन पर अंतिम मुहर लग गई। इस साझेदारी से अस्तित्व में आए एकता मंच के बैनर तले इन दलों ने प्रदेश की सभी 80 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान किया है। 

इनमें तीन दलों के लिए चुनावी समर में आना पहला अनुभव है, जबकि पांच दल पिछले विधानसभा चुनाव में मुकाबिल रहे। तब वोटकटवा की भूमिका में इनकी उपस्थिति पर अंगुलियां उठती रहीं, लेकिन दो सीटें जीतने और कई पर बेहतर प्रदर्शन के चलते इनकी अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 2014 के महासमर के लिए एकता मंच ने जातियों का महासंगम कर एक नया समीकरण खड़ा करने का दांव खेला है। मुसलमान, यादव, राजभर, निषाद, बिंद, पासवान, मौर्या, कुशवाहा, चौहान, नोनिया जैसी जातियों को मिलाकर यह सपा, बसपा और अन्य बड़े दलों के अति पिछड़ा कार्ड के लिए मुसीबत बनने वाले हैं। इनकी सेंधमारी निश्चित तौर पर कोई नया समीकरण बनाएगी और किसी के समीकरण को धराशायी करेगी।

यह गठबंधन जल्द ही सीटें तय करेगा। कुछ उम्मीदवार पहले ही तय किये जा चुके हैं। फूलन सेना, दलित महासंघ और सर्वजन विकास पार्टी पहली बार मैदान में उतरने जा रही है, लेकिन बाकी दल विधानसभा चुनाव में जोर आजमाइश कर चुके हैं। कौमी एकता दल मऊ और गाजीपुर के मोहम्मदाबाद की दो सीटें जीतने में कामयाब रहा, जबकि साझीदार भासपा के साथ उसने बलिया, फेफना, बेल्थरारोड, रसड़ा, घोसी, दिलदारनगर, गाजीपुर, जहूराबाद जैसी सीटों पर मजबूत लड़ाई लड़ी। 

उधर, महान दल भी एक सीट पर दूसरे स्थान पर और दर्जन भर सीटों पर तीसरे और चौथे स्थान पर रहा। आरपीडी की लड़ाई भी रोचक दिखी। कई सीटों पर इन दलों के उम्मीदवारों को भाजपा, बसपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों से भी ज्यादा मत मिले। दरअसल, इन दिनों समाजवादी पार्टी यादव और मुस्लिम समीकरण से इतर अति पिछड़ा कार्ड खेलने में जुटी है और उसकी तीसरे चरण की यात्र भी चल रही है। 

एकता मंच के गठबंधन में जो दल शामिल हैं, इनके अध्यक्ष अपनी अपनी जातियों के क्षत्रप हैं। जाहिर है कि वह अगर अपने समाज को लुभाने में कामयाब नहीं हुए तो भी अपनी बिरादरी के मतों में सेंध लगा सकते हैं। अब ये किसी भी बड़े दल से गठबंधन न करने पर सहमत हैं। 

एकता मंच के बैनर तले आए दल :
कौमी एकता दल के अध्यक्ष, पूर्व सांसद अफजाल अंसारी, भासर्पा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर, महान दल के अध्यक्ष केशव देव मौर्या, राष्ट्रीय परिवर्तन दल के अध्यक्ष, डीपी यादव, फूलन सेना के अध्यक्ष गोपाल निषाद, जनवादी पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश चौहान, सविपा के रामसागर बिंद और दलित महासंघ के अध्यक्ष रामदीन पासवान ने साझा प्रेस कांफ्रेंस में एकता मंच के बैनर तले मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा की। 

नक्सली लालव्रत की उम्मीदवारी :
राबर्ट्सगंज से कौमी एकता दल के कोटे में हार्डकोर नक्सली लालव्रत कोल को उम्मीदवार घोषित किया गया है। कोल की उम्मीदवारी के सवाल पर अफजाल अंसारी ने कहा कि लालव्रत की विचारधारा सशस्त्र क्त्रांति कर अपना हिस्सा लेने की रही है, लेकिन उन्हें चुनाव लड़ने को राजी कर हमने मुख्यधारा से जोड़ा है और यह उम्मीदवारी लोकतंत्र को मजबूती देगी। 

Source: Hindi News

Wednesday, 1 January 2014

Dogged by questions UP government plays the biggest political game



लखनऊ [आनंद राय]। बसपा सरकार में कद्दावर मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा के खिलाफ स्मारक घोटाले में भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज कराना सपा सरकार का सबसे बड़ा सियासी दांव है। सांप्रदायिक दंगों और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर चौतरफा घिरी सरकार ने इस कार्रवाई से एक तीर से कई निशाना साधने की जुगत लगाई है। लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी सपा एक तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को अपना हथियार बनाएगी और दूसरी तरफ कुशवाहा को संरक्षण देने के चुभते सवालों पर विपक्ष का मुंह बंद करने की भी कोशिश करेगी।

विधानसभा चुनाव के दरम्यान अखिलेश यादव जब साइकिल यात्रा लेकर निकले तो स्मारक घोटाले का भ्रष्टाचार उनका सबसे अहम मुद्दा था। वह अपनी किसी सभा में यह कहने से नहीं चूकते कि यदि हमारी सरकार बनी तो स्मारक घोटाला करने वालों को जेल भेजेंगे। 21 माह बाद अखिलेश के उन वादों को एक मुकाम मिला है। हालांकि इसके पहले लैकफेड घोटाले में बसपा सरकार के ही मंत्री बादशाह सिंह, चंद्रदेव राम यादव और रंगनाथ मिश्र को जेल जाना पड़ा। इन्हीं आरोपों में कुशवाहा के खिलाफ भी वारंट बी बना। चार पूर्व मंत्रियों को जेल भेजे जाने के बावजूद सपा सरकार उसका श्रेय नहीं ले पाई। दरअसल एक ही तरह के आरोपों में कुछ पूर्व मंत्रियों को जेल भेजा और कुछ को छोड़ दिया। इससे जांच एजेंसी की नीयत पर तो सवाल उठे ही, दोहरा मापदंड भी उजागर हुआ। अब सतर्कता विभाग के सहारे सरकार ने एक नई पहल की है।


कुशवाहा पर नई रणनीति
बाबू सिंह कुशवाहा के खिलाफ जिस दिन आय से अधिक संपत्ति, भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी में मुकदमा दर्ज होना था, उसके पहले उनकी पत्‍‌नी और भाई सपा में शामिल हो गए। अब उनकी पत्‍‌नी गाजीपुर से सपा की उम्मीदवार है। ऐसे में स्मारक घोटाले में कुशवाहा पर एफआइआर को सरकार की नई रणनीति माना जा रहा है।

शिकंजे में माया के नवरत्न
पहले भी आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार के मामले में माया सरकार के नवरत्‍‌न घिरे हैं। रामवीर उपाध्याय को छोड़ दें, तो राकेश धर त्रिपाठी, रंगनाथ मिश्र, अवधपाल सिंह यादव, बादशाह सिंह, नसीमुद्दीन, बाबू सिंह कुशवाहा, रामवीर उपाध्याय, चंद्रदेव राम यादव और रामअचल राजभर जैसे कद्दावर मंत्रियों पर जांच और मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हुई। रामवीर उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से स्थगनादेश ले रखा है। 

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Wednesday, 31 July 2013

तेलंगाना के साथ-साथ इन अलग राज्यों की हो रही जोरदार मांग - Hindi News

नई दिल्ली। कांग्रेस ने तेलंगाना को पृथक राज्य बनाने का निर्णय कर उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड, हरित प्रदेश और पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग को नई हवा दे दी है

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पढ़ें: तेलंगाना पर खुशी के साथ गुस्सा भी
बसपा अध्यक्ष मायावती अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में इस आशय का प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार को भेज चुकी हैं। लेकिन प्रदेश की मौजूदा सपा सरकार छोटे राज्यों के खिलाफ है।

पढ़ें: मोदी ने सुझाया तेलंगाना के विकास का नुस्खा
बुंदेलखंड राज्य के लिए मुहिम चलाने वाले फिल्म अभिनेता से नेता बने राजा बुंदेला तो तेलंगाना राज्य बनाए जाने के फैसले से खासे उत्साहित हैं। नेशनल फेडरेशन फॉर न्यू स्टेट्स से जुड़े राजा बुंदेला ने कहा कि तेलंगाना राज्य के लिए किया गया संघर्ष आखिरकार रंग लाया और इससे बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वालों को भी उम्मीद की रोशनी दिखाई पड़ी है। मध्य प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव में पृथक बुंदेलखंड का मुद्दा जोर शोर से उठाया जाएगा।
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