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Wednesday, 27 November 2013

lahar Cyclone may come in Andhar Pradesh sea Shore

Cyclone
नई दिल्ली। आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में चक्रवाती तूफान लहर का असर अब कम होता दिखाई दे रहा है। समुद्री तट पर टकराने से पहले ही इसके कमजोर पड़ने की खबर है। इसके आज दोपहर को आंध्र प्रदेश के तट से टकराने की उम्मीद है। मौसम विभाग के अनुसार चक्रवात मछलीपट्टनम से 650 किमी पूर्व-दक्षिणपूर्व और काकीनाडा से 600 किमी पूर्व-दक्षिणपूर्व की दूरी पर स्थित है। इससे पहले फेलिन तूफान के चलते आंध्र और ओडिशा को काफी नुकसान हुआ था। इससे पहले वैज्ञानिक (चक्रवात चेतावनी) एम महापात्र ने इसको बहुत ही गंभीर चक्रवाती तूफान बताया था।

कमजोर पड़ने से पहले आशंका जताई जा रही थी कि इस तूफान के मछलीपट्टनम तट से टकराने के दौरान इसकी रफ्तार बढ़कर 150-160 किमी प्रति घंटा हो जाएगी। इससे पहले बुधवार शाम को आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में 45-55 किमी प्रति घंटा से हवाएं चलीं। देर रात में इनकी रफ्तार 65 किमी प्रति घंटा हो गई।

मौसम विभाग के मुताबिक कमजोर पड़ने के साथ लहर तूफान का खतरा अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। आशंका है कि इसके चलते 2 से 3 मीटर ऊंची लहरें उठ सकती हैं जिससे कुछ जिलों के निचले इलाकों में पानी भर सकता है। इससे कच्चे घरों को भारी नुकसान हो सकता है। साथ ही बिजली, दूरसंचार, रेल और सड़क यातायात भी प्रभावित हो सकते है।

मौसम विभाग के अधिकारियों ने मछुआरों को बृहस्पतिवार को समुद्र में न जाने की सलाह दी है। साथ ही समुद्र में गए मछुआरों से तटों की ओर लौटने को कहा गया है।

लोगों को निकाला गया
तटीय इलाकों से लोगों को निकालकर सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। साथ ही प्रदेश सरकार ने सेना को भी राहत और बचाव कार्य के लिए तैनात किया है। इसके अलावा मेडिकल टीमें और एनडीआरएफ की अतिरिक्त टीमों को भी संभावित प्रभावित क्षेत्रों में लगाया गया है। साथ ही तटीय जिलों के कलेक्टरों ने शैक्षणिक संस्थानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बंद करने का आदेश दिया गया है।

क्या है चक्रवात
दरअसल समुद्री तूफान को चक्रवात कहा जाता है और इन्हें इनकी ताकत और बनावट के मुताबिक नाम दिया जाता है। मौसम विज्ञान में चक्रवात एक ऐसा बंद परिपत्र है जिसका तरल पदार्थ, पृथ्वी के समान एक ही दिशा में चक्कर लगाता रहता है। इसमें आमतौर पर हवा सर्पाकार आकार में, पृथ्वी के उत्तरी गोला‌र्द्ध में दक्षिणावर्त और दक्षिणी गोला‌र्द्ध में वामावर्त रूप से घूमती है। बड़े चक्रवात वाले परिसंचरण लगभग हमेशा कम वायुमंडलीय दबाव के क्षेत्रों पर केंद्रित रहते हैं।

खतरनाक तूफान
समुद्री तूफानों में सबसे खतरनाक हरिकेन को माना जाता है। हरिकेन ज्यादातर क्लॉक वाइज घूमते हैं और इनकी ताकत की कोई सीमा नहीं होती है। यानी हरिकेन के कहर का अंदाजा पहले से लगा पाना काफी मुश्किल होता है। इसकी रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटे से लेकर कुछ भी हो सकती है। कैटरीना और रीटा भी ताकतवर तूफान हैं। हाल फिलहाल में नरगिस को सबसे बड़ा तूफान माना जाता है। 2012 में आए इस तूफान के कहर में करीब 1 लाख लोग मारे गए थे।

प्रभाव
ऐसे चक्रवाती तूफानों में समुद्र बेकाबू हो जाता है। ऊंची से ऊंची उठती हैं जो आसपास के इलाकों को अपनी चपेट में लेकर सब कुछ तबाह कर डालती हैं। समुद्री तूफानों के बाद तटीय क्षेत्रों में 15 से 20 फीट तक पानी भर जाना आम बात है। समुद्री तूफानों की वजह से आने वाली बाढ़ बर्बादी की वजह बन जाती है और इनके कहर से मारे जाने वाले लोगों में आधे से ज्यादा बाढ़ में मारे जाते हैं।


Thursday, 21 November 2013

UP Govt in Tight Spot in SC for Notification on Riot's Victims

Muzaffarnagar Riots

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगों में सिर्फ एक वर्ग को आर्थिक मदद दिए जाने की यूपी सरकार की अधिसूचना पर बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख दिखाया। कोर्ट ने ऐसे कदम पर कड़ा एतराज जताते हुए राज्य सरकार को अधिसूचना वापस लेने का आदेश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह नई अधिसूचना जारी कर हिंसा प्रभावित सभी लोगों को समान मदद दे। सुप्रीम कोर्ट का रुख देखने के बाद प्रदेश सरकार ने भी इसे गलत माना और इस अधिसूचना को वापस लेने का वादा किया।

मुजफ्फरनगर दंगों के सभी मामलों की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। इस कड़ी में बृहस्पतिवार को हिंसा पीड़ित एक वर्ग के वकील एमएल शर्मा ने प्रदेश सरकार पर पक्षपाती होने का आरोप लगाया। उत्तर प्रदेश सरकार की गत 26 अक्टूबर की अधिसूचना का उल्लेख किया, जिसमें सरकार ने मुजफ्फरनगर और शामली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ित सिर्फ मुस्लिम परिवारों को पुनर्वास के लिए 5- 5 लाख रुपये आर्थिक मदद देने की घोषणा की है। अधिसूचना में इसके लिए 90 करोड़ रुपये प्रदेश की आकस्मिक निधि से मुहैया कराए गए हैं। कोर्ट ने इस तरह की अधिसूचना पर कड़ा एतराज जताते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा। प्रदेश सरकार के वकील राजीव धवन ने सफाई दी कि ये अधिसूचना सिर्फ उन लोगों के लिए है, जो हिंसा के कारण गांव छोड़ कर भागे हैं और राहत शिविरों में रह रहे हैं। वे मुस्लिम हैं और भयवश वापस नहीं लौटना चाहते।
हालांकि, धवन ने माना कि सरकार को अधिसूचना में सिर्फ एक वर्ग का जिक्र नहीं करना चाहिए था। कुछ याचिकाकर्ताओं ने अधिसूचना में आर्थिक मदद पाने के लिए कभी वापस न लौटने का शपथपत्र देने की शर्त का विरोध किया। कोर्ट ने सरकार से इस पर भी ध्यान देने को कहा है। इसके अलावा कोर्ट ने सर्दियां शुरू होने के चलते राज्य सरकार को शिविरों में रह रहे लोगों को पर्याप्त सुविधाएं देने का भी आदेश दिया है। इस बीच राज्य सरकार ने हिंसा प्रभावित लोगों को दी जा रही मदद और क्षेत्र में सौहार्द कायम रखने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर तीन स्थिति रिपोर्टे दाखिल कीं। इसके अलावा 13 याचिकाओं का जवाबी हलफनामा दिया। सरकार ने कोर्ट को बताया कि कैंपों में अब सिर्फ 3,000 लोग रह गए हैं। हिंसा में नष्ट हुए ट्रैक्टर ट्रालियों और गन्ने की फसल के मुआवजे के लिए कोर्ट ने प्रभावित लोगों को जिलाधिकारी के समक्ष अर्जी देने को कहा है। ंउधर, केंद्र ने भी बृहस्पतिवार को अपना जवाब कोर्ट में दाखिल किया। मामले पर 12 दिसंबर को फिर सुनवाई होगी।

Wednesday, 20 November 2013

HiTtec Device Will break road Accident

Good News
आगरा, जागरण संवाददाता। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। सड़क पर अक्सर ये स्लोगन वाहन चालकों को ड्राइविंग के दौरान सतर्क रहने का संदेश देता है बावजूद इसके लोग न तो ड्राइविंग में सावधानी बरतते हैं और न ही स्पीड पर कंट्रोल करते हैं। यही कारण है कि मार्ग दुर्घटनाओं में हर साल हजारों लोग जान गंवाते हैं। लेकिन अब खतरा भांपते ही न सिर्फ ड्राइवर को सतर्क होने का संदेश मिलेगा। बल्कि गाड़ी में ऑटोमेटिक ब्रेक भी लग जाएंगे।

हिंदुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के ऑटोमोबाइल छात्रों ने चौपहिया वाहनों के लिए 'टकराव शमन अवरोधक प्रणाली' तैयार की है। इस डिवाइस का ट्रायल सफल रहा है। अब पेटेंट कराने की तैयारी चल रही है। 

यूं काम करेगी डिवाइस :-
डिवाइस इंटेलीजेंट ब्रेक की तर्ज पर काम करती है। करीब 500 ग्राम की डिवाइस को बैटरी से कनेक्ट किया जाता है, जिससे उसे पावर मिलती है। यह सिस्टम एक राडार के माध्यम से 100 मीटर तक 60 डिग्री कोण पर किरणों को भेजता है। ये किरणों इस दायरे में आने वाले वाहनों से टकराकर इलेक्ट्रोनिक्स कंट्रोल यूनिट में पहुंचाती हैं। जिसके आधार पर डिवाइस वाहनों की दूरी को कैलकुलेट कर इसकी सूचना ऑडियो-वीडियो द्वारा डैश बोर्ड पर लगे डिजिटल डिस्प्ले को भेजती है। ऐसे में ड्राइवर को संभावित दुर्घटना की पूर्व सूचना मिल जाती है। इसके बाद भी अगर ड्राइवर मैसेज को अनसुना करता है तो डिवाइस पांच माइक्रो सेकंड के अंतराल पर ऑटोमेटिक ब्रेक लगाने के साथ ही इंजन में ईंधन की सप्लाई को धीमा कर बाद में बंद कर देगी। 

ड्राइवर को नहीं लगेगा झटका :-
तेज रफ्तार वाहनों पर ऑटोमेटिक ब्रेक लगने से ड्राइवर को तेज झटका लगने की संभावना रहती है। जिसे देखते हुए डिवाइस में ई फ्लैश पोटेशियो मीटर लगाया गया है। जिससे ऑटोमेटिक ब्रेक लगने पर ड्राइवर की सीट खुद ब खुद थोड़ा पीछे चली जाएगी और सीट बेल्ट टाइट हो जाएगी। इससे ड्राइवर को तेज झटका नहीं लगेगा। इसके अलावा डिवाइस को मैनुअली भी ऑपरेट किया जा सकेगा। जिससे ट्रैफिक अधिक होने पर ऑटोमेटिक ब्रेक लगने का झंझट खत्म हो जाएगा। 

तीन लाख रुपये की है डिवाइस :-
टकराव शमन अवरोधक प्रणाली को गाड़ी में लगवाने का खर्चा करीब तीन लाख रुपये आएगा।

फिर भी डिवाइस देगी जानकारी :-
डिवाइस कई और सुविधाओं से लैस भई है। डिवाइस को ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम [जीपीएस] से जोड़ा जाएगा। तीन मोबाइल नंबरों को डैश बोर्ड पर उपलब्ध ऑप्शन में अंकित किया जा सकेगा। इससे अगर डिवाइस फेल होती है तो इमरजेंसी नंबरों पर दुर्घटना के बाद ऑटोमेटिक मैसेज पहुंच जाएगा। संदेश में उस क्षेत्र की लोकेशन सहित अन्य जानकारियां भी होंगी।

दो साल की मेहनत अब रंग लाई :-
1 जनवरी 2012 में ऑटो मोबाइल विभाग के अध्यक्ष वाईसी धोटे और शिक्षक दिगंबर सिंह के निर्देशन में द्वितीय वर्ष के छात्र दिलीप पांडेय, तृतीय वर्ष के अंकित दुबे और रजनीश सिंह ने प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। शिक्षक दिगंबर ने प्रणाली को लेकर अहम जानकारियां जुटाई, जिससे छात्रों का कार्य और भी आसान हो गया। डिवाइस तैयार करने में करीब दो साल का समय लगा।

शारदा ग्रुप दे रहा फंड :-
शारदा ग्रुप भी ऑटो मोबाइल के छात्रों की मदद कर रहा है। ग्रुप द्वारा इस प्रोजेक्ट के लिए ढाई लाख रुपये का फंड दिया जा चुका है। भविष्य में और भी फंड मिलने की संभावना है।

Four Died In Road Accident In Moradabad

Road Accident

लखनऊ। समाजवादी पार्टी की आज बरेली में होने वाली रैली में जा रहे अमरोहा के चार लोगों की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। यह दुर्घटना मुरादाबाद में राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुई।

दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग से बरेली जा रहे अमरोहा के चार लोगों की आज मुरादाबाद में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। यह सभी लोग बरेली में होने वाली समाजवादी पार्टी की रैली में जा रहे थे। दुर्घटना का समाचार मिलते ही मंत्री कमाल अख्तर दुर्घटना स्थल पर पहुंचे और घायलों को अस्पताल भेजा।

Tuesday, 29 October 2013

Love is unconditional


Love

धीरे-धीरे ही सही बाजार ने रफ्तार पकड़ ली है। नवरात्र के बाद से ही बाजार अपनी पूरी सजधज के साथ ग्राहकों को लुभाने को सज गए थे। बाजार में घूमते-फिरते आपको भी अंदाजा हो ही गया होगा कि इस बार क्वालिटी और फैशन से ज्यादा चर्चे कीमतों के हैं। दाल-सब्जी और आलू-प्याज की कीमतों की तरह करवाचौथ और अन्य त्योहारों की खरीदारी भी बजट के बाहर हो रही है। सोना ही नहीं चांदी की कीमत भी चढ़ती ही जा रही है।

बजट नहीं सोच बदलिए
एलआईसी में कार्यरत इंदु शर्मा कहती हैं, ''बाजार में चीजों के दाम देखकर होश उड़ जाते हैं। हिम्मत ही नहीं होती कुछ खरीद पाने की। मैं इस त्योहार पर अपने घर को कुछ अलग लुक देना चाहती थी, लेकिन फिर सोचा हर बार फर्नीचर बदलने की जरूरत नहीं होती। उसका अंदाज बदलकर भी घर को नया लुक दिया जा सकता है।''

न बने संकट चौथ
पति की दीर्घायु और घर की सुख-समृद्धि लिए व्रत रखने वाली अपनी पत्नी के प्रति आभार जताने का सभी का तरीका अलग-अलग होता है। बीते कुछ वर्षो में पतियों ने भी करवाचौथ का व्रत रखना शुरू किया है। इस चलन पर राकेश शर्मा कहते हैं, ''मुझे उनके बारे में सुनकर अच्छा लगता है जो अपनी पत्नी के साथ खुद भी करवाचौथ का व्रत रखते हैं। अपनी पत्नी के प्रति आभार जताने का इससे बेहतर तरीका और कोई हो भी नहीं सकता, लेकिन मेरी समस्या ये है कि मैं बहुत ज्यादा देर तक भूखा नहीं रह पाता। ऐसे में मेरी कोशिश रहती है कि मैं उस दिन जितना हो सके अपनी पत्नी के साथ सहयोग करूं।'' राकेश शर्मा की पत्नी सोनिया कहती हैं, ''यह व्रत पति की दीर्घायु के लिए किया जाता है। इतनी महंगाई में यदि पति से महंगे गिफ्ट की अपेक्षा रखेंगे तो यह तो करवाचौथ नहीं, बल्कि संकट चौथ बन जाएगा, क्योंकि अपनी सीमित आय को यदि एक जगह ज्यादा खर्च कर देंगे तो दूसरी जरूरतों पर तो संकट आएगा ही न।''

सदाबहार स्थानीय बाजार
डिग्री कॉलेज में लेक्चरर शिवानी ई-शॉपिंग की दीवानी हैं। इसकी वजह है कि वे व्यस्तता के चलते बाजार नहीं जा पातीं। एक चीज के लिए दिन भर बाजार घूमना थकाऊ ही नहीं उबाऊ भी है उनके लिए। जबकि ई-शॉपिंग में बिना किसी शोर-शराबे के वह इत्मीनान से अपनी जरूरत का सामान खरीद लेती हैं, लेकिन इस बार उनका बजट उन्हें महंगे प्रोडक्ट की ई-शॉपिंग की इजाजत नहीं दे रहा। वह कहती हैं, ''सोचा तो था इस बार करवाचौथ पर डिजाइनर सब्यासाची के नए कलेक्शन से अपने लिए कुछ पसंद करूंगी, लेकिन बजट इसकी इजाजत नहीं देता और फिर दीवाली की भी तो तैयारी करनी है।'' वह आगे कहती हैं, ''ब्रांड नेम होना जरूरी नहीं है, चीज अच्छी होनी चाहिए।'' इसलिए इस बार उन्होंने स्थानीय बाजार का रुख किया है। शिवानी की बात काफी हद तक सही भी है। शॉपिंग जिन महिलाओं का शौक है, वे अच्छी तरह जानती हैं कि इंटरनेट पर मौजूद उत्पाद आकर्षक तो लगते हैं, लेकिन स्थानीय बाजार में मिलने वाले उत्पादों की तुलना में महंगे होते हैं। शिवानी की इस बात का भी समर्थन किया जा सकता है कि ब्रांड नेम के मोह में पड़कर हम कई बार महंगे उत्पाद खरीद लेते हैं, जबकि यदि आपको क्वालिटी की समझ है तो स्थानीय बाजार से भी अच्छे उत्पाद खरीदे जा सकते हैं। 

लगाम फिजूलखर्ची पर
नम्रता जम्वाल जम्मू के बख्शी नगर स्थित वुमन क्रेडिट कोऑपरेटिव लिमिटेड में कार्यरत हैं। इस संस्था को बैंक का ही एक मिनिएचर रूप कहा जा सकता है। यहां महिलाओं की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए 45 हजार रुपये तक का लोन दिया जाता है, ताकि वे स्वावलंबी बन सकें। फिर चाहे बुटीक खोलना हो या गाय खरीदकर न्यूनतम स्तर पर ही दूध का व्यापार करना। नम्रता इस बार करवाचौथ की खरीदारी में पूरी समझदारी से काम ले रही हैं। वह कहती हैं ''जो महिलाएं बड़ी मुश्किल से सौ-सौ रुपये जोड़कर हमारे यहां जमा करवाने आती हैं, त्योहार का लुत्फ तो वे भी उठाती होंगी। इससे यह बात तो साफ है कि महंगाई चाहे जितनी हो जाए त्योहार की रौनक खत्म नहीं हो सकती। सूट सात हजार का है या सात सौ का इससे त्योहार की कीमत नहीं आंकी जाती। ये प्यार का शगुन है। यहां कीमत मायने नहीं रखती।'' वह आगे कहती हैं सबसे अलग दिखने की चाह में हम महंगे से महंगे कपड़े, पर्स, जूइॅल्रि, सैंडिल आदि खरीदते हैं। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब हम कोई महंगी चीज पहनते हैं तो अपने आसपास वालों को उसकी कीमत बताने के लिए लालायित रहते हैं। ऐसे में वे लोग बहुत ज्यादा फ्रस्टेटेड फील करते हैं, जो इतनी महंगी चीजें अफोर्ड नहीं कर सकते। जरूरी नहीं है कि हम 900 रुपये दर्जन की चूड़ियां पहनें। शगुन तो कांच की चूड़ियों का ही होता है, जो बाजार में बीस-तीस रुपये दर्जन में आराम से मिल जाती हैं। अगर हम अपनी फिजूलखर्ची पर लगाम लगा लें तो त्योहारों का मैनेजमेंट बहुत मुश्किल नहीं हैं

कैरेट कम तो कीमत कम
पेशे से अध्यापिका वीना शर्मा कहती हैं, ''ये मुझे हर बार कोई न कोई गिफ्ट जरूर देते हैं, लेकिन इस बार गोल्ड रेट इतने ज्यादा हैं कि हाथ लगाने की हिम्मत ही नहीं हो रही। फिर हमारे ज्वेलर्स ने ही हमें बताया कि अगर हम कम कैरेट की गोल्ड जूइॅल्रि खरीदें तो यह हमारे बजट में आ सकती है। जूइॅल्रि ही तो पहननी है, इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह 24 कैरेट की है या 18 की। ज्यादातर लोग सोने को सेविंग समझकर खरीदते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि आधे से ज्यादा लोग जूइॅल्रि बेचने के लिए नहीं, बल्कि पहनने के लिए खरीदते हैं और जब जूइॅल्रि बेचनी ही नहीं है तो फिर रीसेल वैल्यू की चिंता क्यों करनी।''

 Source- News in Hindi