Tuesday, 29 October 2013

Love is unconditional


Love

धीरे-धीरे ही सही बाजार ने रफ्तार पकड़ ली है। नवरात्र के बाद से ही बाजार अपनी पूरी सजधज के साथ ग्राहकों को लुभाने को सज गए थे। बाजार में घूमते-फिरते आपको भी अंदाजा हो ही गया होगा कि इस बार क्वालिटी और फैशन से ज्यादा चर्चे कीमतों के हैं। दाल-सब्जी और आलू-प्याज की कीमतों की तरह करवाचौथ और अन्य त्योहारों की खरीदारी भी बजट के बाहर हो रही है। सोना ही नहीं चांदी की कीमत भी चढ़ती ही जा रही है।

बजट नहीं सोच बदलिए
एलआईसी में कार्यरत इंदु शर्मा कहती हैं, ''बाजार में चीजों के दाम देखकर होश उड़ जाते हैं। हिम्मत ही नहीं होती कुछ खरीद पाने की। मैं इस त्योहार पर अपने घर को कुछ अलग लुक देना चाहती थी, लेकिन फिर सोचा हर बार फर्नीचर बदलने की जरूरत नहीं होती। उसका अंदाज बदलकर भी घर को नया लुक दिया जा सकता है।''

न बने संकट चौथ
पति की दीर्घायु और घर की सुख-समृद्धि लिए व्रत रखने वाली अपनी पत्नी के प्रति आभार जताने का सभी का तरीका अलग-अलग होता है। बीते कुछ वर्षो में पतियों ने भी करवाचौथ का व्रत रखना शुरू किया है। इस चलन पर राकेश शर्मा कहते हैं, ''मुझे उनके बारे में सुनकर अच्छा लगता है जो अपनी पत्नी के साथ खुद भी करवाचौथ का व्रत रखते हैं। अपनी पत्नी के प्रति आभार जताने का इससे बेहतर तरीका और कोई हो भी नहीं सकता, लेकिन मेरी समस्या ये है कि मैं बहुत ज्यादा देर तक भूखा नहीं रह पाता। ऐसे में मेरी कोशिश रहती है कि मैं उस दिन जितना हो सके अपनी पत्नी के साथ सहयोग करूं।'' राकेश शर्मा की पत्नी सोनिया कहती हैं, ''यह व्रत पति की दीर्घायु के लिए किया जाता है। इतनी महंगाई में यदि पति से महंगे गिफ्ट की अपेक्षा रखेंगे तो यह तो करवाचौथ नहीं, बल्कि संकट चौथ बन जाएगा, क्योंकि अपनी सीमित आय को यदि एक जगह ज्यादा खर्च कर देंगे तो दूसरी जरूरतों पर तो संकट आएगा ही न।''

सदाबहार स्थानीय बाजार
डिग्री कॉलेज में लेक्चरर शिवानी ई-शॉपिंग की दीवानी हैं। इसकी वजह है कि वे व्यस्तता के चलते बाजार नहीं जा पातीं। एक चीज के लिए दिन भर बाजार घूमना थकाऊ ही नहीं उबाऊ भी है उनके लिए। जबकि ई-शॉपिंग में बिना किसी शोर-शराबे के वह इत्मीनान से अपनी जरूरत का सामान खरीद लेती हैं, लेकिन इस बार उनका बजट उन्हें महंगे प्रोडक्ट की ई-शॉपिंग की इजाजत नहीं दे रहा। वह कहती हैं, ''सोचा तो था इस बार करवाचौथ पर डिजाइनर सब्यासाची के नए कलेक्शन से अपने लिए कुछ पसंद करूंगी, लेकिन बजट इसकी इजाजत नहीं देता और फिर दीवाली की भी तो तैयारी करनी है।'' वह आगे कहती हैं, ''ब्रांड नेम होना जरूरी नहीं है, चीज अच्छी होनी चाहिए।'' इसलिए इस बार उन्होंने स्थानीय बाजार का रुख किया है। शिवानी की बात काफी हद तक सही भी है। शॉपिंग जिन महिलाओं का शौक है, वे अच्छी तरह जानती हैं कि इंटरनेट पर मौजूद उत्पाद आकर्षक तो लगते हैं, लेकिन स्थानीय बाजार में मिलने वाले उत्पादों की तुलना में महंगे होते हैं। शिवानी की इस बात का भी समर्थन किया जा सकता है कि ब्रांड नेम के मोह में पड़कर हम कई बार महंगे उत्पाद खरीद लेते हैं, जबकि यदि आपको क्वालिटी की समझ है तो स्थानीय बाजार से भी अच्छे उत्पाद खरीदे जा सकते हैं। 

लगाम फिजूलखर्ची पर
नम्रता जम्वाल जम्मू के बख्शी नगर स्थित वुमन क्रेडिट कोऑपरेटिव लिमिटेड में कार्यरत हैं। इस संस्था को बैंक का ही एक मिनिएचर रूप कहा जा सकता है। यहां महिलाओं की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए 45 हजार रुपये तक का लोन दिया जाता है, ताकि वे स्वावलंबी बन सकें। फिर चाहे बुटीक खोलना हो या गाय खरीदकर न्यूनतम स्तर पर ही दूध का व्यापार करना। नम्रता इस बार करवाचौथ की खरीदारी में पूरी समझदारी से काम ले रही हैं। वह कहती हैं ''जो महिलाएं बड़ी मुश्किल से सौ-सौ रुपये जोड़कर हमारे यहां जमा करवाने आती हैं, त्योहार का लुत्फ तो वे भी उठाती होंगी। इससे यह बात तो साफ है कि महंगाई चाहे जितनी हो जाए त्योहार की रौनक खत्म नहीं हो सकती। सूट सात हजार का है या सात सौ का इससे त्योहार की कीमत नहीं आंकी जाती। ये प्यार का शगुन है। यहां कीमत मायने नहीं रखती।'' वह आगे कहती हैं सबसे अलग दिखने की चाह में हम महंगे से महंगे कपड़े, पर्स, जूइॅल्रि, सैंडिल आदि खरीदते हैं। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब हम कोई महंगी चीज पहनते हैं तो अपने आसपास वालों को उसकी कीमत बताने के लिए लालायित रहते हैं। ऐसे में वे लोग बहुत ज्यादा फ्रस्टेटेड फील करते हैं, जो इतनी महंगी चीजें अफोर्ड नहीं कर सकते। जरूरी नहीं है कि हम 900 रुपये दर्जन की चूड़ियां पहनें। शगुन तो कांच की चूड़ियों का ही होता है, जो बाजार में बीस-तीस रुपये दर्जन में आराम से मिल जाती हैं। अगर हम अपनी फिजूलखर्ची पर लगाम लगा लें तो त्योहारों का मैनेजमेंट बहुत मुश्किल नहीं हैं

कैरेट कम तो कीमत कम
पेशे से अध्यापिका वीना शर्मा कहती हैं, ''ये मुझे हर बार कोई न कोई गिफ्ट जरूर देते हैं, लेकिन इस बार गोल्ड रेट इतने ज्यादा हैं कि हाथ लगाने की हिम्मत ही नहीं हो रही। फिर हमारे ज्वेलर्स ने ही हमें बताया कि अगर हम कम कैरेट की गोल्ड जूइॅल्रि खरीदें तो यह हमारे बजट में आ सकती है। जूइॅल्रि ही तो पहननी है, इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह 24 कैरेट की है या 18 की। ज्यादातर लोग सोने को सेविंग समझकर खरीदते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि आधे से ज्यादा लोग जूइॅल्रि बेचने के लिए नहीं, बल्कि पहनने के लिए खरीदते हैं और जब जूइॅल्रि बेचनी ही नहीं है तो फिर रीसेल वैल्यू की चिंता क्यों करनी।''

 Source- News in Hindi

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