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Wednesday, 1 January 2014

Kejriwal government will face vote of confidence in Delhi Assembly



नई दिल्ली। दिल्ली में सरकार बनाकर नया इतिहास रचने वाली आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार को बृहस्पतिवार को दिल्ली विधानसभा में विश्वास मत हासिल करना है। कांग्रेस ने एक बार फिर दोहराया है कि वह 'आप' सरकार के समर्थन में वोट देगी। अब इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है कि सरकार सदन में अपना बहुमत साबित कर देगी। इस बीच, भाजपा के वरिष्ठ नेता जगदीश मुखी ने स्पीकर पद के लिए नामांकन दाखिल किया है। भाजपा अपने सभी 31 विधायकों विश्वास मत के खिलाफ वोट करने के लिए व्हिप जारी करेगी।

आज दोपहर दो बजे 'आप' के विधायक मनीष सिसोदिया सदन में विश्वास प्रस्ताव रखेंगे और इस पर चर्चा के बाद वोटिंग कराई जाएगी। चर्चा में 'आप' के आठ विधायक भाग लेंगे। 

उधर, केजरीवाल द्वारा यह कहे जाने पर कि उनके पास वक्त कम बचा है, के अलग सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। उन्हें कहीं न कहीं विधानसभा में सरकार की हार का खतरा भी है। आखिर केजरीवाल को इस बात का डर क्यों है, आइए जानते हैं सदन के आंकड़ों के लिहाज से इसका जवाब :-

सदन के आंकड़े
अगर सदन के गणित की बात करें तो अकाली दल के साथ भाजपा के 32 विधायक हैं। इधर आप के 28 विधायक हैं और कांग्रेस के 8 विधायक सरकार को समर्थन कर रहे हैं। जनता दल यूनाइटेड के शोएब इकबाल ने भी आप को समर्थन दिया है। इस प्रकार सदन में सरकार के पक्ष में 37 विधायक हैं, जबकि बहुमत के लिए 36 विधायकों का समर्थन चाहिए।

कांग्रेस के एक विधायक मतीन अहमद को प्रोटेम स्पीकर बना दिया गया है। इसके बावजूद सरकार के पक्ष में 36 मत पड़ने चाहिए। यदि ऐसा ही होता है तो सरकार को कोई खतरा नहीं है। लेकिन कांग्रेस के जयकिशन और आप के दिनेश मोहनिया बुधवार को शपथ लेने सदन में नहीं पहुंचे। जाहिर तौर पर यदि वे बृहस्पतिवार को भी सदन में नहीं पहुंचे तो सत्ता पक्ष की संख्या घटकर 34 रह जाएगी। अगर, कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट विधायक भी आप के खिलाफ चले जाते हैं तो सरकार को खतरा है, लेकिन देखने वाली बात यह है कि कांग्रेसी विधायक आलाकमान की ही बात मानेंगे।

उधर, यदि निर्दलीय विधायक रामवीर शौकीन भाजपा के पाले में वोट करते हैं तो विपक्ष के वोट 33 तक पहुंच जाएंगे। ऐसे में यदि सत्ता पक्ष के दो और विधायक सदन की बैठक से अनुपस्थित हो जाते हैं तो सरकार सदन में हार सकती है।

कांग्रेस के दिल्ली प्रभारी डॉ. शकील अहमद ने बुधवार को यह बयान दिया कि कांग्रेस तो आप की सरकार को समर्थन देने को तैयार है, लेकिन सत्ताधारी दल को अपने विधायकों की चिंता करनी चाहिए। वर्तमान सियासी माहौल में उनके इस बयान के गंभीर राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार कम वक्त होने की बात कहने से भी अनिश्चितता का माहौल बन रहा है।

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Congress has no other way to continue the support to Delhi government




[अजय पांडेय], नई दिल्ली। दिल्ली की सियासत का यह बेहद यादगार लम्हा है। बृहस्पतिवार का दिन सूबे में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी सरकार की किस्मत तय कर देगा। विपक्षी भाजपा चाहती है कि यह सरकार गिर जाए। खुद सत्ताधारी दल के हुक्मरानों को भी (आप के नेता बार-बार कांग्रेस पर आंखें तरेर रहे हैं) सरकार के गिर जाने की परवाह नहीं है। और कांग्रेस की बेबसी देखिए कि वह न चाहते हुए भी इस सरकार को एक प्रकार से अपने कंधों पर ढोने को विवश है। वह बिलकुल नहीं चाहती कि यह सरकार कम से कम इस वक्त गिरे। इस सरकार की जिंदगी वह अपने हिसाब से तय करना चाहती है।

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली वालों को रोजाना 666 लीटर मुफ्त पानी देने का फैसला कर दिया। उन्होंने बिजली की कीमत को आधा करने का वादा भी निभा दिया। निजी बिजली कंपनियों की नाक में नकेल डालने का काम करते हुए उन्होंने इनके खातों की कैग से जांच कराने का आदेश भी जारी कर दिया। राजनीतिक फायदे नुकसान की बात करें तो उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया है। उनका यह अनुमान बिलकुल सही लगता है कि यदि अगले कुछ महीनों में दिल्ली विधानसभा के फिर से चुनाव हुए तो उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हो जाएगा।

दूसरी ओर सत्ता से चार कदम पीछे रह गई भाजपा भी चुनाव चाहती है। यदि यह सरकार गिर जाती है तो सियासी दृष्टि से भाजपा के रणनीतिकारों का खुश होना लाजिमी है। पार्टी की सोच यह है कि यदि सरकार गिर गई और चुनाव की नौबत आई तो थोड़े दिनों के राष्ट्रपति शासन के बाद लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा के भी चुनाव होंगे और पार्टी अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की लहर में दिल्ली का चुनाव भी जीत लेगी।

सियासी जानकारों की मानें तो एकमात्र कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो कम से कम इस माहौल में चुनाव बिल्कुल नहीं चाहती। पार्टी के एक विधायक ने कहा कि इस वक्त हमने ऐसा क्या कर दिया है जिसे लेकर हम जनता के बीच जाएंगे। जाहिर है कि 15 साल की अपनी सत्ता गंवा चुकी पार्टी को फिलहाल चुनाव भारी घाटे का सौदा समझ में आ रहा है। शायद यही वजह है कि वह किसी भी कीमत पर अगले कुछ महीनों तक इस लंगड़ी सरकार की बैसाखी बने रहना चाहती है।

कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि जून-जुलाई की गर्मियों में पानी-बिजली को लेकर मचने वाला हाहाकार केजरीवाल की लोकप्रियता की हवा निकाल देगा और तब हवा कांग्रेस के पक्ष में बहने लगेगी। उस समय न मोदी की लहर का खतरा होगा और न ही केजरीवाल का जादू काम करेगा। अब देखना यह है कि बृहस्पतिवार को सदन में किसकी किस्मत बुलंद होती है।

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