Sunday, 5 January 2014

2014, Ten Years of Manmohan Singh Exile


अमृतसर [रमेश शुक्ला 'सफर']। मेरे 'मोहन' ने मेरी सुन ली। कृष्ण भक्त हूं, बचपन से ही मोहन के साथ मन की बातें करता आया हूं। बचपन, जवानी मोहन के साथ बीती है। एक मोहन भगवान कृष्ण तो दूजे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह [मेरा मोनू]। बीते 12 दिसंबर को मंदिर घर में मोहन से प्रार्थना की थी कि 'हे मोहन'! मेरे मनमोहन को सद्बुद्धि दे। दस साल हो चले हैं, मिला ही नहीं हमसे। अच्छा तो यही है कुर्सी छोड़े दे, उम्र भी तो हो चली है। हमारे लिए वो तो 'वनवास' ही चला गया। 

मैं धन्य हूं कि मेरी मोहन ने भी सुनी और मनमोहन ने भी। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दस साल बाद कहा कि 'अब प्रधानमंत्री मैं नहीं'। अब कृष्ण भगवान से यही कहता हूं कि 'हे मोहन', खुश रहे मनमोहन' खुश रखना उसे हमेशा। यह प्रार्थना वाले 'हाथ' दोस्ती के वो हाथ हैं जिन्हें राजनीति से सरोकार नहीं, वो दोस्ती का 'फूल' खिलाते हैं। हम और 'आप' की बातों में नहीं आते। यह हाथ हैं प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के गहरे मित्र व सहपाठी पठानकोट के विक्रम सिंह के। 

विक्रम सिंह प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के वहीं सहपाठी है, जिन्होंने दैनिक जागरण के माध्यम से डॉ. मनमोहन सिंह से कुर्सी छोड़ने की सलाह बीते 13 दिसंबर को दी थी। 'मोनू! छोड़ दो कुर्सी, बाकी मर्जी 'आप' की' दैनिक जागरण में प्रकाशित हुई तो चैनल दौड़े थे।

विक्रम सिंह हंसते हुए कहते हैं कि 'अब कहीं मेरे मोनू को लेकर 'आप' यह मत छाप देना की वो राजनीति के काबिल नहीं हैं। वो हैं काबिल, लेकिन स्वच्छ, निष्पक्ष राजनीति के। दस साल तक मेरा मोहन बोला, लेकिन 'मन' से नहीं। मोहन ने क्या नहीं दिया देश को। मोहन ने तन, मन, धन सब कुछ अर्पण किया है देश के लिए।
मैं जानता हूं कि वो कितने ईमानदार हैं, शायद 'आप' भी नहीं। खुशी है कि मोनू! कालेज के दिनों में कहा करता था कि विक्रम, देखना एक दिन तेरा मोनू तुझे कुछ बनकर दिखाएगा, सच हुआ, मोनू से कब वो डॉ. मनमोहन सिंह हुआ, और कब नोटों पर उसके हस्ताक्षर चलने लगे और कब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे। जिंदगी जैसे पलों में गुजर गई'। इतने के साथ ही फोन पर ही विक्रम सिंह भावुक हो गए। 

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