Monday, 6 January 2014

Guru Gobind Singh Ji festival of lights

गुरु गोविंद सिंह जी का मानना था कि समाज की उन्नति उच्च आदर्शो से ही संभव है, इसीलिए उन्होंने मनुष्य के परिष्कार के लिए साहित्य को प्रश्रय दिया। गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व (7 जनवरी) पर विशेष.. 

सिखों के दसवें गुरु श्री गोविंद सिंह जी का मानना था कि परिष्कृत जीवन से ही सफलता मिल सकती है। इसके लिए व्यक्ति को स्वयं का परिष्कार करना होगा। किंतु यह परिष्कार तभी संभव हो पाएगा, जब सबसे पहले मानसिकता का परिष्कार हो। इसीलिए गुरु गोविंद सिंह जी ने साहित्य और साहित्यकारों को प्रश्रय दिया और लोगों की मानसिकता को एक नया आयाम देने के लिए साहित्य का सृजन कराया। गुरु जी स्वयं एक साहित्यकार, दार्शनिक, चिंतक, भाषाविद और आदर्श सेनानायक थे। मात्र 42 वर्ष का उनका जीवन-काल इतना उदात्त है, जिससे प्रेरित होकर मनुष्य जीवन के उच्चतम आदर्शो को प्राप्त कर सकता है।

गुरु गोविंद सिंह जी ने शोषित-पीड़ित लोगों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। उन्होंने अन्याय से त्रस्त जनता को एकत्र कर 'खालसा पंथ' का सृजन किया और शक्तिशाली सेना तैयार की। इस सेना ने अपने समय की बड़ी सैन्य शक्तियों को परास्त किया। गुरुजी ने शक्तिहीन आम जनता को राजनीतिक शक्ति सम्पन्न बना दिया। खालसा पंथ ने जाति-पाति, ऊंच-नीच आदि की दीवारें भी तोड़ दीं। गुरु जी का संदेश था कि सभी में मनुष्य समान हैं और सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में उनकी भागीदारी का अधिकार भी समान है।

गुरु जी ने मानवता की रक्षा के लिए अपने सारे वंश का बलिदान दिया। गुरु जी के परदादा पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव, नौवें गुरु श्री तेग बहादुर एवं चारों पुत्रों ने शहादत दी। गुरु जी ने स्थापित किया कि सत्य एवं मानवता की रक्षा के लिए सर्वस्व भी बलिदान करना पड़े तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए।

गुरु गोविंद सिंह जी न सिर्फ स्वयं भी साहित्यकार थे, बल्कि वे कलम के धनी विद्वानों एवं कवियों के आश्रयदाता भी थे। सिख परंपरा के अनुसार, गुरु जी के पाऊंटा साहिब, आनंदपुर साहिब एवं लखी जंगल के विद्या दरबारों में 52 कवि एवं 34 विद्वान थे। ये कवि एवं विद्वान विभिन्न क्षेत्रों में संबंध रखते थे। कवि नंदलाल गजनी से, कवि सुदामा और कवि कुंवरेश बुंदेलखंड से, कवि ईश्वर दास आगरा से, कवि सुखदेव राय बरेली से, कवि गोपाल गोकुल से, कवि कांशी राम बनारस से और कवि वृंद मेड़ता से दशमेश दरबार में प्रवाहित ज्ञान सरिता में स्नान करने आए थे। धर्म और जाति की दृष्टि से भी इन कवियों की पृष्ठभूमि भिन्न-भिन्न थी। गुरु दरबार में बिना किसी भेदभाव के मात्र कला, विद्वता और प्रतिभा को ही सम्मान दिया जाता था। भाषा की दृष्टि से भी दशमेश दरबार में कोई संकीर्णता नहीं थी। गुरु जी स्वयं ब्रज, फारसी, सघुक्कड़ी, संस्कृत आदि कई भाषाओं के विद्वान थे। 

गुरु दरबार के कवि एवं विद्वान नित्य ही धर्म, संस्कृति, इतिहास, सामाज, राजनीति, काव्य आदि विषयों पर निरंतर अध्ययन-मनन और सृजन करते रहते थे। गुरु जी का मानना था कि समाज की उन्नति मनुष्य की मानसिकता में परिष्कार से ही हो सकती है और यह साहित्य के माध्यम से ही संभव है। अत: उन्होंने साहित्य सृजन को प्रोत्साहित किया। उन्होंने रामायण, महाभारत सरीखे प्राचीन सांस्कृतिक ग्रंथों का जनभाषा में अनुवाद भी कराया।

सत्य, मानवता, समानता, सर्वधर्म समभाव, स्वाभिमान की रक्षा आदि ऐसे जीवन मूल्य है,ं जो गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन से प्राप्त होते हैं। इनके अभाव में समाज और राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं।

डॉ. राजेन्द्र साहिल

No comments:

Post a Comment