बिजनौर, [आशीष तोमर]। हम बाल दिवस के मौके पर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को याद कर रहे हैं। आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले नेहरू ने स्वप्न देखा था कि विकास एक दिन रिस-रिस कर देश के सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचेगा। लेकिन आजादी के 66 साल बाद भी यह तस्वीर सवाल करती है कि आखिर विकास अटका कहां है?
14 नवंबर को बाल दिवस पर पूरे देश में भाषण होंगे और बच्चों को चाचा नेहरू जैसा बनने को कहा जाएगा। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली से बमुश्किल डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर मंडावर कस्बे का यह किशोर बैल के साथ बुग्गी में जुता अपने परिवार का बोझ खींच रहा होगा। मंडावर के गांव रायपुर में कई महीनों से घूमंतू जाति के कई परिवार डेरा डाले हुए हैं। इनकी रोजी-रोटी इलाके के किसानों के कृषि यंत्र बनाने और उनकी मरम्मत करने से चलती है। गरीबी उन्मूलन के हजारों करोड़ के बजट में से इनमें से किसी को एक फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं होती है। इनका घर इनकी बैल-बुग्गी ही है। जहां रोजी-रोटी मिल जाती है, वहीं बुग्गी रुक जाती है। इन्हीं परिवारों में एक संजय का परिवार भी है। गरीबी तो इनकी नियति है, लेकिन संजय पर इसकी मार कुछ ऐसी पड़ी कि परिवार को एक बैल बेचना पड़ा। बैल बिक गया, लेकिन 'जिंदगी की बुग्गी' को तो खींचना ही है। अब परिवार को कहीं जाना होता है तो परिवार का किशोर मनोज दूसरे बैल की जगह बुग्गी में खुद जुड़ जाता है। कभी-कभार परिवार के दूसरे लोगों को भी बुग्गी में जुतना पड़ता है। इस हालात-ए-हाजिरा के बाद शिक्षा, बाल अधिकार और बाल कल्याण की बात करना बेमानी ही है। चाचा नेहरू के स्वप्न टूट रहे हैं और आज के हमारे रहनुमा दिवास्वप्न में डूबे हैं। चूंकि ऐसे परिवार कहीं के मतदाता नहीं होते और उनकी मर्जी से राजनीतिज्ञों का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, इसलिए उनकी बात कहने और इस बच्चे के जानवर सरीखे उपक्रम पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
[चूंकि ऐसे परिवार कहीं के मतदाता नहीं होते और उनकी मर्जी से राजनीतिज्ञों का कुछ बनता-बिगड़ता भी नहीं, इसलिए उनकी बात कहने और इस बालक के जानवर सरीखे उपक्रम पर किसी का ध्यान नहीं जाता..]
जिंदगी हर कदम इक नई जंग
आगरा, [जितेंद्र शर्मा। बच्चे तो भगवान होते हैं। बच्चे ही च्च्चे इंसान होते हैं। उनसे जुड़े हुए राष्ट्र के अरमान होते हैं। हां, ये बच्चे वो हैं, जो ये सब कुछ होते हुए भी मजबूरी की जंजीर से जकड़े हैं लेकिन फिर भी इनके लिए सम्मान है। बात टेढ़ी बगिया की एक झोंपड़ी में रहने वाले दो सगे भाई अजय और सलमान की हो रही है। बेशक, ये फिल्मी सितारे नहीं, लेकिन अपने परिवार और आसपास के हीरो हैं। वह भीख मांगते हैं लेकिन इसके बावजूद खुद पढ़ रहे हैं और बहन को पढ़ा रहे हैं।
ये जागरण संवाददाता बुधवार को रिपोर्टिग को जा रहा था। सूरसदन तिराहे पर तभी इन बच्चों को तेजी से जाते देखा। चेहरे में कुछ मासूमियत थी। ऐसे में दोनों को रोक कर इनके बारे में जानना चाहा। आवाज दी तो एक पल ठिठके, इधर-उधर देखा और फिर चल दिए। शायद उन्हें लगा कि किसी और को बुलाया जा रहा है। दोबारा आवाज दी तब रुके। उनसे बात शुरू हुई। बच्चे बोले, बाबूजी, जल्दी भगवान टॉकीज पहुंचना है बारह बज गए। अब सवाल था, ऐसा वहां क्या होने वाला है? तब एक जिम्मेदारी भरा जवाब मिला। बोले, हम भगवान टॉकीज से हरीपर्वत चौराहे तक एमजी रोड पर भीख मांगते हैं। स्कूल से आते ही ठीक बारह बजे यहां आ जाते हैं। मां कहती है शाम को पांच बजे तक जरूर घर लौट आना। तब तक कम से कम इतना पैसा तो जुटा लें कि आज रात का और कल सुबह का खाना बन जाए। इसीलिए जल्दी है।
मां कहती है गंदे बच्चों से दूर रहना
बच्चों की यह बात सुन उनके बारे में और जानने की उत्कंठा हुई। भीख मांगते इन दोनों भाइयों के कपड़े तो बहुत मैले थे, लेकिन चेहरा और हाथ-पैर एकदम साफ दिख रहे थे। उनको कुछ पैसे दिए और बात आगे बढ़ाई। उन्होंने बताया कि रोज जो पैसा कमाते हैं, वह जाकर मां को दे देते हैं। पिता के शराबी होने की वजह से इसी आय से परिवार का गुजारा होता है। उन्हें किसी तरह के नशे का शौक नहीं। भीख मांगते दूसरे बच्चों से बात करने पर वह कह देते हैं कि उनसे कोई मतलब नहीं। वजह यह कि मां कहती है गंदे बच्चों के साथ नहीं रहना।
बहन को पढ़ाना है
इन दो भाइयों की एक छोटी बहन है। खेलने-कूदने की उम्र में ये जिम्मेदारी उठाए चल पड़े हैं। कहते हैं कि छोटी बहन को भी पढ़ाएंगे-लिखाएंगे, इसलिए अपने ऊपर एक भी पैसा खर्च न कर सारा पैसा मां को देते हैं। खुद भी प्राइमरी में पढ़ रहे हैं, शायद किस्मत बदल जाए।
Source- News in Hindi
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