आगरा। यही तो नसीब है। फांसी का तख्ता जो सबको बिना पलभर की देरी किए मौत देने को तैयार रहता है, लेकिन एक कैदी के लिए उसने जैसे इन्कार कर दिया। जिस तख्त पर कैदी को खड़ा कर फांसी पर लटकाने की तैयारी हो रही थी, उसके लीवर ने अचानक इन्कार कर दिया। ऐसे में जिला जेल प्रशासन के अधिकारियों ने भी हाथ खड़े कर दिए।
फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में निरुद्ध इटावा के कैदी जफर अली ने अपने भाई और भतीजों की हत्या कर दी थी। निचली अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। अपीलों का दौर चला लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने भी फैसला बदला नहीं। उसकी सजा को बरकरार रखा। पिछले महीनों में जफर अली की दया याचिका राष्ट्रपति की ओर से खारिज करने के बाद उसके ब्लैक वारंट जारी कर दिए गए। इसके बाद उसे आगरा की जिला जेल में फांसी देने की तैयारियां शुरू कर दी गईं।
यहां लंबे समय से कोई फांसी नहीं हुई थी, ऐसे में जर्जर हो चुके फांसी घर की कोठरी की मरम्मत कराई गई। जिस पिलर (गैलोज) पर फांसी से लटकाना था उसे बदला। कैदी को जिस बैरक में फतेहगढ़ से लाकर रखा जाना था, वहां से फांसी घर तक मार्ग ऊबड़-खाबड़ हो चुका था, जिस पर खड़ंजा कराया गया। इसके बाद फांसी के तख्ते को खींचने वाले लीवर को चेक किया। दो दशक से भी ज्यादा समय से लीवर का प्रयोग नहीं होने के कारण वह सही ढंग से कार्य करता हुआ नहीं मिला।
ऐसे में जेल प्रशासन ने लीवर मैकेनिक की तलाश शुरू की। आगरा समेत आसपास के जिलों में भी फांसी के तख्ते का लीवर सही करने वाले को तलाशा लेकिन कोई नहीं मिला। हारकर जिला जेल प्रशासन ने यहां फांसी को स्थगित करने का फैसला लेने की संस्तुति आला अधिकारियों से की। जिला जेल अधीक्षक संतलाल यादव ने बताया फांसी के तख्ते का लीवर खराब है, इससे आला अधिकारियों को अवगत करा दिया है।
यही नहीं जफर अली को अब आगरा जेल में फांसी नहीं लगाई जाएगी। फतेहगढ़ सेंट्रल जेल के वरिष्ठ अधीक्षक यादवेंद्र शुक्ला का कहना है कि कैदी को अब नैनी सेंट्रल जेल में फांसी देने तैयारी की जा रही है। हालांकि गोपनीयता की वजह से उसका समय नहीं बताया जा रहा है।
गैलोज पर सूत के फंदे का परीक्षण
जिस पिलर पर फांसी दी जाती है उसे गैलोज कहते हैं। जिस रस्से से कैदी को फांसी दी जाती है उसे सूत से तैयार करते हैं। रस्से को तैयार करने के बाद गैलोज पर 70 से 80 किलो वजन का पत्थर लटका कर उसकी मजबूती का परीक्षण किया जाता है। ताकि फांसी देने के दौरान फंदा बीच में टूट न जाए। इन सबकी भी तैयारी की जा रही थी।
बाइस साल पूर्व दी गई थी फांसी जिला जेल के फांसीघर में अब तक 35 कैदियों को फांसी दी जा चुकी है। पहली फांसी 24 जनवरी 1951 में पीलीभीत के नवल सिंह पुत्र खूबीराम को दी थी। जबकि आखिरी बार दो फरवरी 1991 में कैदी जुम्मन पुत्र जफर को फांसी दी गई थी।
Source- News in Hindi
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