Thursday, 24 October 2013

Diminishes the possibilities of treasures

unnao
लखनऊ [रूमा सिन्हा]। खजाने की तलाश में ज्यों-ज्यों जमीन के नीचे पर्ते खुल रही हैं, संभावनाएं धूमिल पड़ती नजर आ रही हैं। डौंडियाखेड़ा में छह दिन की खुदाई में अब तक जो सामग्री मिली है, उससे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) असमंजस में है। जमीन की ऊपरी तह में मिले पुरावशेष नवाबी दौर यानी 18वीं सदी से पहले के हैं। ऐसे में साफ है कि जैसे-जैसे जमीन की गहराई में और नीचे जाएंगे, इससे पहले के ही चिह्न मिलेंगे। 

एएसआइ को यह खुदाई अंधेरे में तीर चलाने के समान नजर आ रही है। वैसे एएसआइ, जमीन के नीचे जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआइ) की रिपोर्ट के मुताबिक पांच से बीस मीटर की गहराई में जाने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की बात कहती है।
पुरावशेषों के रूप में अबतक जो सामग्री डौंडियाखेड़ा में प्राप्त हुई है, उसके बारे में फिलहाल कुछ पक्का नहीं है, लेकिन नवाबी काल से पूर्व की बतायी जाती हैं। यह बात असमंजस में डालने वाली है। तर्क यह भी दिया जा रहा है,यदि किसी चीज को गड्ढा करके दबाया जाता है तो उस स्थिति में यह मुमकिन है कि अठारहवीं सदी से पहले के अवशेष जमीन की कोख में वैसे महफूज रहे हों। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो.डीपी तिवारी कहते हैं कि यदि गड्ढा करके किसी चीज को दबाया जाता है तो वहां की मिट्टी ढीली हो जाती है जबकि अगल-बगल की मिट्टी सख्त रहती है। ऐसे में पुरातत्वविद् इसे आसानी से पहचान सकते हैं।
मंत्री महंत चरण दास ने इसकी पहल की थी लिहाजा उनके खिलाफ कोर्ट में केस किया जाएगा।

वह इस बात से इंकार करते हैं कि यदि 16वीं अथवा 17वीं सदी के पुरावशेष जमीन के नीचे महज दो मीटर गहराई की खोदाई में मिल रहे हैं तो 18 वीं सदी में राजा रामबख्श सिंह का खजाना और नीचे मिलेगा। एक हजार किलो सोना दबा होने की बात कतई संभव नहीं लगती है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि राजा की हैसियत इतना सोना रखने की नहीं थी। डॉ.तिवारी इस पर भी यकीन नहीं करते कि अन्य राजाओं ने उनके पास सोना रखवाया था, जबकि उन्हें फांसी दिए जाने की बात काफी पहले घोषित हो गई थी। यदि किसी का सोना उनके पास रखा भी था तो फांसी दिए जाने से पहले वापस ले लेता। 

Source: News in Hindi

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