नई दिल्ली [जयप्रकाश रंजन]। फंसे कर्ज (एनपीए) जब खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गए, तब जाकर केंद्र सरकार की नींद खुली है। अब ज्यादा एनपीए वाले बैंकों के प्रबंधन पर नकेल कसी जा रही है। साथ ही, फंसे कर्जो की वसूली के लिए नए कदम भी उठाए जा रहे हैं। इस क्रम में सरकार ने इस हफ्ते शनिवार (23 नवंबर) को देश भर में लोक अदालत लगाने का फैसला किया है। बैंकों के साथ कर्ज विवाद में फंसे ग्राहक इस दिन लोक अदालत पहुंच कर अपने मामले का निपटारा कर सकते हैं।
वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक सरकारी बैंकों के साथ विदेशी, निजी बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां भी इस दिन ग्राहकों के साथ फंसे कर्ज संबंधी विवाद का निपटारा लेने के लिए लोक अदालत का सहारा ले सकती हैं। वित्त मंत्रालय के अधिकारी स्वीकार करते हैं कि पिछले तीन चार वर्षो का अनुभव बताता है कि एनपीए (गैर निष्पादक परिसंपत्तियां) कम करने में लोक अदालतें बुरी तरह से असफल रही हैं। इसके बावजूद इस तरीके का इस्तेमाल करना जरूरी है। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि लोक अदालत में काफी जल्दी से मामलों का निपटारा हो जाता है। साथ ही, एनपीए खाताधारकों से जो भी राशि मिलती है, वह तत्काल मिल जाती है।
पिछले वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान बैंक लोक अदालतों में 3,828 एनपीए के मामले ले गए। इन खाताधारकों पर जितनी राशि बकाया थी, उसका महज 10 फीसद (386 करोड़ रुपये) ही वसूल हो पाया था। वित्त मंत्रालय ने फंसे कर्ज वसूली में बुरी तरह से फिसड़्डी रहने वाले बैंकों को खास तौर पर निर्देश दिया है कि वे लोक अदालत के जरिये जहां तक हो सके एनपीए कम करने की कोशिश करें। इसमें स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ त्रवणकोर, आइडीबीआइ बैंक, सिंडिकेट बैंक, देना बैंक, यूको बैंक समेत दस सरकारी बैंक शामिल हैं।
फंसे कर्ज की वसूली के लिए बैंकों के पास लोक अदालत समेत तीन हथियार मौजूद हैं। दो अन्य तरीके ऋण वसूली टिब्यूनल और एसएआरएफएईएसआइ कानून, 2002 (प्रतिभूतिकरण व वित्तीय परिसंपत्तियों के पुनर्गठन) हैं। वित्त मंत्रलय के आंकड़े खुद ही गवाही देते हैं कि उक्त तीनों तरीके पिछले 2-3 वर्षो में बुरी तरह से असफल हो चुके हैं।
Source- Business Hindi News
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