Tuesday, 5 November 2013

Instead of Staying in Congress Increased Factionalism

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नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी में गुटबाजी रोकने की जितनी कोशिश कर रहे हैं, हकीकत में वह उतनी ही बढ़ती जा रही है। इसका ही नतीजा है कि हर हाल में एक माह पहले टिकट घोषित कर देने का राहुल फार्मूला असफल रहा और अभी तक कांग्रेस पांच राज्यों के चुनावों के लिए टिकटों के मंथन में जुटी हुई है। उस पर तुर्रा यह कि दो सबसे बड़े राज्यों राजस्थान और मध्य प्रदेश में अब तक जो टिकट बंटे, उससे गुटबाजी और मजबूत होकर उभरी है। कांग्रेस कार्यालय पर लगातार जारी प्रदर्शन भी इस बात को पुष्ट कर रहे हैं।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस दफा सभी राज्यों में टिकटों के वितरण के लिए कुछ नियत फार्मूले तय किए थे। गुटबाजी रोकने और जमीनी कार्यकर्ताओं को मौका देने के लक्ष्य के साथ वह इसे लागू कराने में जुटे थे। सबसे अहम था कि किसी भी हालत में टिकट कम से कम एक माह पहले घोषित कर दिए जाएंगे, ताकि उम्मीदवारों को प्रचार का पर्याप्त वक्त मिल सके। मगर राहुल के आदर्शवाद पर व्यवहारिकता हर पल भारी पड़ रही है।
पहले तो टिकट समय से घोषित नहीं हो पाए। उस पर टिकटों के वितरण व्यवस्था में एक नई टीम राहुल उभरकर आई। वह अब तमाम क्षत्रपों के साथ एक अलग ही गुट बन गई है। टिकटों के वितरण में इस टीम की कहीं चली, जहां नहीं चली वहां कांग्रेस और गुटों में बंट गई। मध्य प्रदेश में तो खैर पार्टी गुटों में बंटी ही थी और दिग्विजय, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य, सुरेश पचौरी जैसे नेताओं के समर्थकों के बीच खींचतान लगातार जारी ही रही। 115 टिकटों की पहली सूची तो यहां जैसे-तैसे जारी हो गई, लेकिन आधी सीटों पर मगजमारी अभी तक जारी है।
सबसे बुरा हाल तो राजस्थान का हो गया है। वहां पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पूरी स्वतंत्रता देने के बजाय उनके पर कतरे जा रहे हैं। राहुल गांधी के खास कहे जाने वाले सीपी जोशी और भंवर जितेंद्र सिंह ने ऐसी घेरेबंदी की है कि गहलोत अपने हिसाब से टिकट नहीं दिला पा रहे हैं। जोशी को भी चुनाव लड़ाने की बात है, इससे गहलोत के नेतृत्व पर सीधे सवाल उठेंगे। राजस्थान की गुटबाजी में राहुल खुद इतना उलझ गए हैं कि टिकटों को तय करने में पसीने छूट रहे हैं।

Source- News in Hindi

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