धीरज कुमार झा, अमृतसर। दे दो गुर्दा नहीं तो बना देंगे मुर्दा। यह अल्फाज हैं किडनी गंवाने वाले शख्स के, जो पिछले दस साल से खौफ के साये में जी रहा है। किडनी निकालने से पहले उसे इतना टार्चर किया गया कि अब भी उसके चेहरे पर खौफ है। इसलिए उसकी जुबान बंद रही। किडनी गंवाने के बावजूद अपना दर्द उसने न तो परिवार और न ही अपने करीबियों को बताया। पिछले दिनों अदालत द्वारा किडनी कांड के दोषियों को सजा सुनाने के बाद उसने इस बारे में बोलने की हिम्मत जुटाई।
बिहार राज्य के मधेपुरा जिला के फुलौत गांव का रहने वाला उमेश यादव (पिता लखनपाल यादव) पेट भरने के लिए डेढ़ दशक पहले पंजाब आया था, लेकिन उसकी किडनी निकाल ली गई। किडनी गंवाने वाले उमेश को 'दैनिक जागरण' ने ढूंढ निकाला।
उमेश ने दैनिक जागरण के साथ खास बातचीत में कहा कि मत याद दिलाइए उस घटना की। अभी भी डर लगता है। उन्होंने बहुत मारा था। किडनी निकालने के बाद अमृतसर छोड़कर चले जाने के लिए कहा था। दस-बारह साल पहले की बात है। काम करने अपने गांव के लोगों के साथ अमृतसर आया। एक-दो लोग आकर मिले। कहा कि नौकरी चाहिए। उन्होंने नौकरी देने का झांसा देकर उसे बुलाया। होटल में भरपेट खाना खिलाया। इसके बाद उससे कहा कि नौकरी चाहिए तो एक काम करना होगा। इसके लिए पैसे भी मिलेंगे। आनाकानी की तो उसके सिर पर मारा गया। डरा-धमका कर एक अस्पताल में उसकी किडनी निकाल ली गई। किडनी निकालने के बाद नौकरी की बात तो दूर उन्होंने यहां से भाग जाने के लिए कहा। किडनी गंवाने के कारण पेट में अभी भी तकलीफ होती है। शरीर रिक्शा चलाने में सक्षम नहीं है।
गौरतलब है कि इस मामले में पांच डॉक्टरों सहित छह को कैद की सजा दी जा चुकी है।
सबका फर्जी था एड्रेस, किसी नहीं चला पता
पुलिस ने वर्ष 2002 में किडनी कांड को बेनकाब करने के बाद आथोराइजेशन कमेटी के चेयरमैन डा. ओपी महाजन के कार्यालय से किडनी ट्रांसप्लांट की करीब 1400 फाइलें अपने कब्जे में ली थीं। फाइलों में दर्ज किडनी देने वाले लोगों के पते पर पुलिस ने कई बार नोटिस भेजे। दस्तक भी दी, लेकिन सब कुछ फर्जी होने के कारण आज तक किडनी गंवाने वाला कोई भी शख्श पुलिस के हाथ नहीं आया। पुलिस के पास इस मामले में सबसे अहम गवाह बगीचा सिंह उर्फ राजू ही था, लेकिन अदालत में गवाही देने से पहले ही सड़क हादसे में उसकी मौत हो गई।
Source- News in Hindi
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