Monday, 4 November 2013

Legendary Pakistani Folk Singer Reshma

Legendary Pakistani Folk Singer Reshma
[नवनीत शर्मा]
प्रसिद्ध पाकिस्तानी लोक गायिका रेशमा के निधन के साथ ही एक सशक्त लोक स्वर हमसे बिछड़ गया। 66 वर्षीय रेशमा का रविवार को लाहौर में निधन हो गया। वह लंबे समय से गले के कैंसर से पीड़ित थीं। दमादम मस्त कलंदर और लंबी जुदाई जैसे गीतों की अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति से उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। रेशमा का जन्म राजस्थान में बीकानेर में बंजारा परिवार में हुआ था।
लोक स्वर ऐसा जिसे सुनते हुए राजस्थान के रेगिस्तान की खुरदराहट और बंजारों की रगों में दौड़ती मस्ती पूरी शिद्दत से महसूस होती थी। ज्यादातर भारतीयों के लिए रेशमा से परिचय का अर्थ फिल्म 'हीरो' के गीत, चार दिनां दा प्यार हो रब्बा बड़ी लंबी जुदाई.. से है, लेकिन रेशमा ने जब-जब और जो भी गाया वह पूरे दिल से गाया। यह बख्शीश लोक से सींचे जाने पर ही मिलती है कि मंदर सप्तक से लेकर तार सप्तक तक रेशमा की आवाज में कहीं कोई टूटन नहीं आती। हाय ओ रब्बा नइयो लगदा दिल मेरा.. जैसा गीत गाकर वह हमारे अंदर छिपी हुई शाश्वत उदासी को धीरे-धीरे जगाते हुए मंझे हुए मनोवैज्ञानिक की तरह बाहर ले आती हैं। लोग इसे आज भी याद करते हैं कि पाकिस्तान के ही मशहूर गायक रहे और मेहदी हसन के शिष्य परवेज़ मेहदी के साथ गाया उनका गाना, गोरिए, मैं जाणा परदेस.. में किस तरह रेशमा की सुरीली हूंक परवेज की हरकतों और मुर्कियों पर भारी पड़ी थी। उनकी जवानी से लेकर बुढ़ापे के दौर तक में उनके साक्षात्कारों में एक साफगोई और अविरल विचार प्रवाह हमेशा नजर आया। उर्दू और पंजाबी के मिश्रण में बात करते हुए रेशमा ने कभी नहीं छुपाया कि वह पढ़ी-लिखी नहीं हैं और भाषा पर उनका कोई अधिकार नहीं है। न रेशमाजी ने वे अदाएं सीखीं जो नए लोग तब भी सीख लेते हैं जब उन्हें संगीत की सही समझ न हो। साक्षात्कार लेने वाले को वह कभी बाबू साहब, कभी बाबू तो कभी बेटा कह कर ही संबोधित करती थीं।

भारत का जिक्र आते ही वह उस सम्मान के बारे में जरूर बात करती थीं जो उन्हें यहां मिला। स्टूडियो में जाने से घबराने वाली रेशमाजी के अनुरोध पर लंबी जुदाई गाना दिलीप कुमार के घर पर रिकॉर्ड हुआ था। वे उन चंद पाकिस्तानी कलाकारों में थीं जिन्हें पाकिस्तान ने समझा और कद्र भी की। उन्हें कॉमेडियन बब्बू बराल और गजल गायक मेहदी हसन जैसे फनकारों की तरह इलाज के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ा। यह कहना हालांकि बहुत रवायती होगा, लेकिन सच यही है कि सांस्कृतिक संदर्भो में रेशमा भारत और पाकिस्तान के बीच एक पुल की तरह थीं।

राजस्थान में बसा रेशमा का बंजारा परिवार विभाजन के दौरान कराची चला गया था। उन्हें होश संभालने पर भारत और राजस्थान का पता चला होगा तो शायद न चाहते हुए भी उदासी के साथ एक रिश्ता कायम हो गया होगा। इस बात की पुष्टि उन्होंने अपने कई साक्षात्कारों में की। रेशमा की आवाज में कोई चुलबुला गीत सुन कर ऐसी चुलबुलाहट महसूस होती है जो घोर उदासी के बाद आती है। ऐसा उनके गीत, मेरी हमजोलियां, कुछ यहां कुछ वहां.. को सुनते हुए महसूस किया जा सकता है। रेशमा की यह खूबी रही कि वह उस कराची में रहकर भी अपनी संवेदनशीलता बरकरार रख पाई, जिसके बारे में मुश्ताक अहमद यूसुफी ने लिखा था, 'यहां के मच्छर डीटीटी से नहीं, कव्वालों की तालियों से मरते हैं।'

Source- News in Hindi

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