जागरण ब्यूरो, लखनऊ : विधायक राजाराम पाण्डेय के निधन के कारण अखिलेश मंत्रिमंडल का पाचवा विस्तार तो टल गया मगर, मंत्रिमण्डल में जातीय संतुलन को लेकर दबाव से उबरना सपा के लिए आसान नहीं है। सपा के प्रदेश की सत्ता संभालते ही प्रभावशाली छत्रपों ने मंत्रिमण्डल में आने की लामबंदी शुरू कर दी थी। इसी दबाव का नतीजा है कि डेढ़ साल से कुछ अधिक के अंतराल में ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को मंत्रिमण्डल का चार बार विस्तार करना पड़ा। पाचवा विस्तार भी इसी क्रम में होना था। 59 सदस्यीय मंत्रिमण्डल में एक ब्राह्मण, छह यादव, पाच क्षत्रिय, तीन मुस्लिम, दो अनुसूचित जाति और जाट जाति के एक विधायक को कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल है।
दस अक्टूबर को चौथे विस्तार में निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह को मंत्री बनाया गया था। तीन सप्ताह बाद ही आज शुक्रवार को पांचवें विस्तार में एक राज्य मंत्री को प्रमोशन देकर कैबिनेट में स्वतंत्र प्रभार दिये जाने और एक नए राज्य मंत्री शामिल किये जाने की संभावना थी ताकि मंत्रिमंडल ब्राह्मणों की नुमाइंदगी संतुलित हो सके। कुछ दिन पहले ब्राह्मंण समाज के कई विधायकों ने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से मुलाकात भी की थी और तर्क दिया था कि सपा के 21 विधायक ब्राह्मण हैं मगर उनकी नुमाइंदगी के लिए मंत्रिमण्डल में एक ही कैबिनेट मंत्री है।
लोकसभा चुनाव करीब हैं, और पार्टी 17 अति पिछड़ी जातियों को एससी में शामिल करने और अति पिछड़ों को लुभाने लिए यात्रा निकाल रही है। लेकिन इस वर्ग से कैबिनेट मंत्री नहीं है, इस वर्ग से भी अब दबाव बढ़ाया जा रहा है। मुस्लिम नुमाइंदे भी पीछे नहीं है, सपा के बड़े समर्थकों में शुमार इस वर्ग के नुमाइंदों का मानना है कि उनके कोटे के तीन कैबिनेट मंत्रियों में से एक वकार अहमद गंभीर रूप से बीमार हैं। दूसरे कई विवादों से घिरे हैं, तीसरे विधान परिषद सदस्य हैं। इधर राज्यमंत्रियों व कैबिनेट मंत्रियों के बीच अख्तियार को लेकर खींचतान भी चल रही है। इस बीच हर नया विस्तार दबाब बनाने की नई जमीन तैयार कर देता है।
Source- News in Hindi
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