मुंबई। देश के बैंकिंग तंत्र में कर्ज पुनर्गठन के मामले बेतहाशा बढ़ रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बी महापात्रा का कहना है कि कर्ज पुनर्गठन की स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई है। इस साल जून तक पूरे बैंकिंग तंत्र में पुनर्गठित की गई कर्ज संपत्ति बढ़कर 3.25 लाख करोड़ रुपये हो गई। कर्ज पुनर्गठन का समझौता एक तरह से नुकसान साझा करने की व्यवस्था है।
सालाना बैंकॉन सम्मेलन में महापात्रा ने कहा कि मार्च, 2011 तक पुनर्गठित किए गए कर्ज 1.1 लाख करोड़ रुपये के प्रबंधन योग्य स्तर पर थे, लेकिन हालात अब काबू से बाहर हो गए हैं। अब ऐसे कर्ज बढ़कर 2.7 लाख करोड़ रुपये के हो गए हैं। यह स्थिति केवल कॉरपोरेट क्षेत्र के कर्जो की है। द्विपक्षीय कर्ज पुनर्गठन के मामलों को जोड़ने पर कुल 3.25 लाख करोड़ रुपये के कर्ज पुनर्गठित किए जा चुके हैं। इस समस्या से निपटने के लिए सभी पक्षों को मिलकर कदम उठाने की जरूरत है।
आरबीआइ कुछ हद तक पुनर्गठन में वृद्धि को स्वीकार करता है। नियमन के स्तर पर केंद्रीय बैंक कुछ हद तक छूट देने को तैयार हैं, लेकिन बैंकरों को इसके लिए ज्यादा रकम सुरक्षित करने का प्रावधान करना होगा। कर्ज लेने वालों को भी इसके लिए त्याग करना चाहिए और उन्हें ज्यादा हिस्सेदारी जुटानी चाहिए। महापात्रा ने रेखांकित किया कि आरबीआइ ने कुछ मामलों में पुनर्गठित कर्जो पर सुरक्षित रखी जाने वाली रकम दो से बढ़ाकर पांच फीसद कर दी है।
महापात्रा के मुताबिक, फिलहाल हालात दहशत पैदा करने वाले नहीं हैं। फंसे हुए कर्ज (एनपीए) और पुनर्गठित कर्जो की कुल रकम 10 फीसद से कम है। यह वर्ष 1997 में पैदा हुए एशियाई वित्तीय संकट के दौर से काफी कम है। उस वक्त यह स्तर कुल कर्जो के 16 फीसद तक पहुंच गया था।
Source- Business Hindi News
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