Thursday, 14 November 2013

Unfortunate That There is no Witness Protection Plan: SC

witness protection
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं होने पर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत का कहना है कि इसी का परिणाम है कि गवाह लगातार प्रतिपक्षी (हॉस्टाइल) हो रहे हैं और आपराधिक मामलों में बगैर योग्यता के बरी होने वालों की तादात बढ़ रही है।

न्यायमूर्ति रंजना देसाई और मदन बी लोकुर की पीठ ने कहा, 'जब तक गवाहों की रक्षा नहीं की जाती अयोग्य लोगों के बरी होने की बढ़ती संख्या को रोका नहीं जा सकता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे ने ध्यान आकृष्ट नहीं किया।' पीठ ने कहा कि गवाहों को सुरक्षा मुहैया कराने का मुद्दा एक गंभीर मामला है कि जिसका समाधान अभी नहीं किया गया है। पीठ ने यह टिप्पणी दहेज हत्या के मामले में फैसला देते हुए की। इस मामले में पीड़िता के माता-पिता प्रतिपक्षी हो गए, जिसके आधार पर निचली अदालत ने पति को आरोप मुक्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह बहुत दु:खद है कि माता-पिता भी बेटी की ओर से नहीं खड़े हुए। हम यह नहीं समझ पा रहे कि किस तरह एक महिला खासकर एक मां अपनी बेटी से मुंह मोड़ सकती है। संभवत: इन गवाहों को अपीलकर्ता ने खरीद लिया। पीठ ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसने उसने पीड़िता के पति को दोषी करार देते हुए छह साल कैद की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि यह पता लगाने की जरूरत है कि गवाह लगातार क्यों प्रतिपक्षी बन रहे हैं? ऐसा आचरण लालच और करुणा के अभाव को दर्शाता है। यदि पीड़िता के माता-पिता को अपीलकर्ता ने धमकी दी है और अपने पक्ष में गवाही देने के लिए मजबूर किया है तो यह हमारी व्यवस्था का दु:खद प्रतिबिंब है, जिसमें गवाहों को असुरक्षित छोड़ दिया जाता है। गवाहों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था लागू नहीं है।

इस मामले में वर्ष 1987 में शादी के तत्काल बाद पीड़िता का पति उसे अपने माता-पिता के यहां से दहेज लाने के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से प्रताड़ित करने लगा। वर्ष 1991 में 17 अक्टूबर को उसने पीड़िता पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। अस्पताल में मरने के पहले उसने इस घटना के लिए पति को जिम्मेदार ठहराया। पीड़िता के माता-पिता के गवाही से मुकर जाने के कारण निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया था।

Source- News in Hindi

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